खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत : विनाश को बुलावा

 -दिगम्बर
दिल्ली में फेरी-खोमचे वालों का प्रदर्शन : फोटो -द हिन्दू 

मनमोहन सिंह सरकार ने आखिरकार खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत दे दी। सरकार का यह फैसला इस कारोबार से अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले करोड़ों परिवारों के लिए तबाही और बर्बादी का फरमान है। अनेक ब्राण्ड वाले खुदरा व्यापार में पहले विदेशी पूँजी का प्रवेश वर्जित था, वहाँ अब 51 फीसदी पूँजी निवेश के साथ विदेशी नियंत्रण की छूट हो गयी। एक ब्राण्ड वाली दुकानों में विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 51 फीसदी थी जिसे हटा कर अब 100 फीसदी पूँजी निवेश की इजाजत दे दी। विपक्षी पार्टियों और खुद अपने ही गठबन्धन के कुछ सहयोगी पार्टियों के विराध को पूरी तरह नजरन्दाज करते हुए सरकार ने यह फैसला मंत्रीमंडल की बैठक में लिया। संसद का सत्र जारी होने के बावजूद उसने इस मुद्दे पर बहस चलाने की औपचारिकता भी पूरी करना भी जरूरी नहीं समझा। सरकार की साम्राज्यवाद परस्ती और विदेशी पूँजी के प्रति प्रेम को देखते हुए यह कोई अचरज की बात नहीं।

खुदरा व्यापार में विदेशी सरमायादारों की हिस्सेदारी और नियंत्रण की पूरी तरह इजाजत देने के लिए सरकार पर लम्बे अरसे से विदेशी दबाव पड़ रहा था। अमरीका और यूरोप में मंदी और संकट के गहराते जाने के साथ ही यह बेचैनी और भी बढ़ती गयी। जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के समय दुनिया का विराट खुदरा व्यापारी कम्पनी वालमार्ट का प्रतिनिधि भी यहाँ आया था और दोनों देशों के पूँजीपतियों के साझा प्रतिनिधि मंडल ने उस वक्त सरकार को जो माँगपत्र पेश किया था, उसमें खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी निवेश की जबरदस्त सिफारिश की गयी थी। सरकार उस दौरान ही इसके लिए तत्पर थी। लेकिन अपने गठबन्धन के प्रमुख सहयोगी, वामपंथी पार्टियों के विरोध को देखते हुए इस काम को एक झटके में कर डालना उसके लिए आसान नहीं था। इसी लिए सरकार ने इस एजन्डे को टुकड़े-टुकड़े में और कई चरणों में पूरा करने की रणनीति अपनायी। अनाज और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की थोक खरीद-बिक्री में विदेशी पूँजी लगाने की छूट देना, कोटा-परमिट-लाइसेंस की समाप्ति, वैट लागू करके पूरे देश में बिक्री कर को सरल और समरूप बनाना, सीलिंग के जरिये आवासीय इलाकों से दुकानें हटवाना, छोटे-बड़े शहरों में मॉल, मार्केटिंग कॉमप्लेक्स और व्यावसायिक इमारतों के लिए पूँजीपतियों को सस्ती जमीनें मुहैया कराना और ऐसे ही ढेर सारे उपाय इसी दिशा में उठाये गये कदम हैं। इसी के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता वस्तुओं के थोक व्यापार, रखरखाव, भंडारण, कोल्डस्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग, माल ढुलाई और आपूर्ति जैसे खुदरा व्यापार के लिए जरूरी और सहायक कामों में सरकार ने सौ फीसदी विदेशी पूँजी निवेश की पहले ही इजाजत दे दी थी।
सरकार की इन्हीं मेहरबानियों का लाभ उठाते हुए दैत्याकार अमरीकी बहुराष्ट्रीय खुदरा व्यापारी वालमार्ट के 2006 में सुनील मित्तल की कम्पनी भारती इन्टरप्राइजेज के साथ गठजोड़ करके भारत के बाजार में दाखिल होने का ऐलान किया था। चूंकि खुदरा दुकान खोलने की इजाजत विदेशी कम्पनी को नहीं थी। इसलिए वालमार्ट को पृष्टभूमि में रहकर आपूर्ति और अन्य जिम्मेदारियाँ निभानी थी। इन देशी-विदेशी सरमायादारों ने आजादी की 60वीं वर्षगाँठ पर 15 अगस्त 2007 को ही देश के विभिन्न शहरों में लगभग 100 खुदरा बिक्री केन्द्रों की शुरूआत करने का फैसला लिया था।
लगभग पाँच वर्ष पहले ही वालमार्ट ने भारत में अपना बिजनेस डेवलमेन्ट एण्ड मार्केट रिसर्च ऑफिस खोला था। इसका मकसद भारत के खुदरा व्यापार में मुनाफे का अनुमान लगाने के अलावा यहाँ नेताओं, मंत्रियों, आला अफसरों, अर्थशास्त्रिायों और मीडिया से तालमेल बिठा कर खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना था। साथ ही, अमरीकी सरकार भी भारत सरकार पर लगातार इसके लिए दबाव देती रही। इन सारी बातों को देखते हुए सरकार का यह फैसला कोई अप्रत्याशित नहीं।
भारत का कुल खुदरा व्यापार लगभग 25,00,000 करोड़ रुपये है जिसमें भारी हिस्सा छोटे-बड़े किराना दुकान, फड-खोखा, ठेला-खोमचा, हाट-व्यापार या फेरी वालों का है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2009-10 के अनुसार थोक और खुदरा व्यापार में 4 करोड़ 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है जो कुल श्रमशक्ति के 10 फीसदी से भी अधिक है। इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो स्वरोजगार में लगे हुए हैं। इन लोगों की रोजी-रोटी छीनने के लिए तेजी से फलफूल रहे खुदरा व्यापार पर पहले ही बड़ी कम्पनियों के मेगामार्ट, सुपर बाजार और बडे़ मॉल की घुसपैठ शुरू हो गयी थी। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में मित्तल, अम्बानी, टाटा, बिड़ला जैसे इजारेदार घरानों की दिलचस्पी काफी बढ़ी है। इसके बीच कई खुदरा कम्पनियों के विलय और गठजोड़ भी हुए हैं।
खुदरा व्यापार में भारी मुनाफे के लोभ में पिछले कुछ वर्षों से हर छोटे-बड़े शहर में पुराने ढर्रे की दुकानों की जगह चमक-दमक वाले मेगा मार्ट और डिपार्टमेंटल स्टोर खुलने लगे। सुभेक्षा, स्पेंसर, बिग बाजार, विशाल मेगामार्ट, त्रिनेत्र और सुपर रिटेल जैसी संगठित खुदरा व्यापार कंपनियों की भारी कमाई को देखते हुए कई दूसरे इजारेदार घराने भी इस दौड़ में शामिल होने लगे. छोटी पूंजी और अपने परिवार की मेहनत से रोजी-रोटी चलानेवाले छोटे दुकानदारों को उजाड़ने के लिए तो अरबों-खरबों की पूंजी लेकर अखाड़े में उतरने वाले देशी सरमायेदार ही काफी थे. अब खुदरा व्यापार पर निर्भर लोगों को निगलने के लिए सरकार ने खुद अपने ही देश में ‘बेन्तोविले का दानव’ नाम से कुख्यात वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को भी बुला लिया.
पांच साल पहले वालमार्ट और भारती के बीच गठजोड़ के बाद खुदरा व्यापार क्षेत्र में पांव पसारने के लिए भारत के बड़े पूंजीपतियों की सरगर्मी को देखते हुए यह लगभग तय था कि सरकार इसे विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल देगी. टाटा ने आस्ट्रेलिया की कंपनी बुलवर्थस् के साथ गठजोड़ करके क्रोमा नाम से खुदरा दुकानों की शृंखला शुरू की. अम्बानी ने भी रिलाएंस फ्रेश के नाम से खुदरा चेन शुरू की तथा शुभेक्षा, अदानी और अन्य खुदरा कंपनियों के अधिग्रहण का प्रयास किया. पेंटालून रिटेल के किशोर बियानी ने 2007 में 100 नए बिग बाजार खोलने की घोषणा की थी. बिडला ग्रुप ने 172 सुपर बाजारों के मालिक त्रिनेत्र कंपनी का अधिग्रहण किया था. दूसरी ओर केयरफोर, मेंट, मेट्रो और टेस्को भी भारत में अपने संश्रयकारी (कोलेबोरेटर) की तलाश करने में मशगूल थे और उनकी आड़ में अपनी दुकानें भी खोल रहे थे.
मॉल और सुपर बाजार का फैलता जाल 

विदेशी बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियों के मुनाफे का बड़ा हिस्सा विदेशी कारोबार से आता है. 2007 में अमरीकी कंपनी वालमार्ट का विदेशों से आनेवाला मुनाफा 379 अरब डॉलर था जो भारत के कुल खुदरा व्यापार से भी ज्यादा और भारत के सकल घरेलु उत्पाद के एक चौथाई के बराबर बैठता है. भारतीय पूंजीपति इन विराट पूंजी और तकनोलोजी के मालिक कंपनियों के साथ साझेदारी करके अपने देश की लूट में हिस्सा पाने को लालायित हैं.

दुनिया का अनुभव बताता है कि जिन देशों में इन दैत्याकार कंपनियों ने अपना कारोबार फैलाया वहाँ अपनी भारी-भरकम पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति पर इजारेदारी के दम पर खरीद, भण्डारण और वितरण में लगे आपूर्ति शृंखला के तमाम बिचौलियों को तबाह कर दिया. उनके भारी मुनाफे का राज यही है. देशी बिचौलियों को समाप्त करने के बाद उन कंपनियों ने एक तरफ छोटे-मझोले उत्पादकों और दूसरी ओर विशाल उपभोक्ता समूह को दोनों हाथों से लूटना शुरू किया. हमारे देश में पहले ही खेती में घाटा उठाकर आत्महत्या कर रहे किसानों और महँगाई की मार झेल रहे उपभोक्ताओं के ऊपर इस सरकारी फैसले का क्या असर होगा, इसे समझने के लिए हमें मनमोहन सिंह या मोंटेक सिंह अहलुवालिया जितना अर्थशास्त्र पढने की जरुरत नहीं है.
वे हमें बताना चाहते हैं कि विदेशी खुदरा व्यापार कम्पनियाँ यहाँ एक करोड नए रोजगार पैदा करेंगी. वे यह नहीं बताते कि इसकी कीमत उन साढ़े चार करोड़ परिवारों को चुकाना पड़ेगा जिनकी जीविका उन कम्पनियों के आते ही दाँव पर लग जायेगी. ऊँची तकनीक और कम मजदूर रखनेवाली इन कंपनियों का रोजगार के मामले में क्या रिकार्ड है, इसे वालमार्ट के उदहारण से ही समझा जा सकता है. दुनिया के 14 देशों में वालमार्ट के 6200 मेगामार्ट हैं जिनमें 16 लाख लोग काम करते हैं और भारत के कुल खुदरा व्यापारियों के बराबर कमाई करके वालमार्ट को देते हैं. जाहिर है कि ये कम्पनियाँ कुछ लाख लोगों से ही अपना सारा काम करवाएँगी और पहले से रोजगार में लगे करोड़ों लोगों को सडकों पर फेंक देंगी.
अपने ही देश अमरीका में वालमार्ट एक बदनाम कंपनी है जहाँ इसके खिलाफ मुकदमें, विरोध और प्रदर्शनों का सिलसिला चलता ही रहता है. न्यू यार्क और लॉस एंजेल्स के स्थानीय लोगों के विरोध के चलाते वहाँ आज तक उसकी एक भी शाखा खुल नहीं पायी. इंडोनेशिया में वालमार्ट द्वारा उजाड़े गये दुकानदारों ने लगातार उसके ऊपर हमले किये जिसके बाद कंपनी को वहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा.
खुदरा व्यापार में उतरने वाले देशी-विदेशी सरमायादारों की प्राथमिकता उत्पादन बढ़ाना और उसका स्तर सुधारना नहीं है. उनका मकसद यहाँ रोजगार के अवसर पैदा करना भी नहीं है. उनकी निगाह 5 करोड़ उच्च मध्यवर्ग और उससे निचले पायदान पर खड़े 10 करोड़ मध्य वर्ग कि ओर लगी है जिन्हें रिझाने के लिए वे वितरण और विक्री की व्यवस्था को अत्याधुनिक और आकर्षक बनाने में लगे हैं. इसीलिए उन्होंने मध्यवर्ग की कुल संख्या, उसकी खरीद क्षमता, अभिरुचियों और जरूरतों पर ढेर सारे शोध और अध्ययन करवाए हैं. इन्हीं मुट्ठी भर लोगों कि माँग के अनुरूप वातानुकूलित मॉल में सजी-धजी चीजें उपलब्ध करने में उनकी दिलचस्पी है. देश की आम जनता जो खरीदने की क्षमता न होने के चलते बाजार की परिधि से बाहर है, वह उनकी कार्यसूची से भी बाहर है.
अमरीका में वालमार्ट के खिलाफ प्रदर्शन  : फोटो -अर्थ फर्स्ट  

ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत में आने के बाद यहाँ के मुट्ठी भर विश्वासघाती लोगों के साथ दुरभिसंधि करके षड्यंत्रों के जरिये इस देश को गुलाम बनाया था. नयी गुलामी के वर्तमान दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने उस पुरखे को भी मत दे दी है. भारत में प्रवेश से पहले ही उन्होंने यहाँ की सरकार और सरमायादारों के साथ मिलकर षडयंत्रकारी तरीके से अपने अनुकूल कायदे-कानून बनावा लिये. सरकार की पूरी राज मशीनरी उनकी हिफाजत के लिए मुस्तैद है.

लेकिन विदेशी खुदरा व्यापारियों के लिए भारत में पांव पसारना निरापद नहीं. 22 फरवरी 2007 को, जब वालमार्ट का प्रतिनिधि-मंडल खुदरा व्यापार में उतरने की अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने भारत आया था, तब दिल्ली, मुंबई और बंगलुरु सहित देश के कई शहरों में खुदरा व्यापारियों, फेरी-खोमचा-ठेले वालों, व्यापारी संगठनों और कई संगठनों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किये थे. दिल्ली के वाणिज्य मंत्रालय की तरफ कूच करते प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. हालांकि प्रतिरोध अभी काफी कमजोर है और राजनीतिक पार्टियों का रुख भी औपचारिक और ठंडा है, लेकिन हालात ऐसे ही नहीं बने रहेंगे. आखिर कोई तो हद होगी? लोग कब तक चुपचाप बैठे अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहेंगे?    
   
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टिप्पणियाँ

  • arun kumar  On दिसम्बर 2, 2011 at 10:54 पूर्वाह्न

    अमेरिका में वालमार्ट की शुरुआत के दस वर्ष के अन्दर ही आयोवा (IOWA) प्रान्त के 555 किराना दुकानें, 298 हार्डवेयर दुकानें, 290 बिल्डिंग मटेरियल दुकानें, 161 जनरल स्टोर, 158 महिला प्रसाधन स्टोर, 150 जूता दुकानें एवं 110 मेडिकल स्टोर बन्द हो गये…। (Source: Iowa State University Study)

  • teeboli  On सितम्बर 23, 2012 at 5:26 अपराह्न

    ऍफ़ डी आई के पक्ष में एक बड़ा क्रूर तर्क दिया जा रहा है कि किसानो के पास अपने उत्पाद बेचने के लिए ढेर सारे मौके होंगे.किसान सीधे अपना उत्पाद बेचेगा.अब बात आती है कि इस मनमोहनी ऍफ़ डी आई में सभी किसानो का उत्पाद खरिदने का व्यवस्था कि गयी है……….नहीं……यह गलती खुले व्यापार के हिमायती कर ही नहीं सकते.बढ़िया माल ही खरीदा जाये गा.और जिन किसानो का मॉल नही खरीदा गया…..उसका माल बिना हिचक के देशी बिचौलिए खराब बता औने पौने दम पर खरीदेंगे. खैर …….तुलसी उवाच फिर सही होगा "खेती न किसान को ……" पूरा कर लीजिये

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