आधार : मिथकों के आधार पर

आर. रामकुमार

दो देश। दोनों के प्रधानमंत्रियों की अपनी-अपनी प्रिय योजनाएँ। दोनों के सुर बिलकुल एक जैसे। टोनी ब्लेयर ने नवम्बर 2006 में पहचान पत्र विधेयक 2004 के लिए समर्थन जुटाते समय कहा था कि पहचान पत्र का मामला स्वतंत्रता का मामला नहीं हैं, बल्कि आधुनिक दुनिया का मामला है।मनमोहन सिंह ने सितम्बर 2010 में नंदुरबार में पहला आधार संख्या वितरित करते हुए कहा कि आधार… नए और आधुनिक भारत का प्रतीक है। मि. ब्लेयर ने कहा कि हम पहचान पत्रों के साथ जो करने कि कोशिश कर रहे हैं वह आधुनिक प्रौद्योगिकी को उपयोग में लाना है।डॉ सिंह ने कहा कि आधार योजना आज के नवीनतम और आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करेगा।समान सोच कि कोई हद नहीं है।

मि. ब्लेयर ने पहचान पत्र लागू करने के लिए जो बहुचर्चित प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाये उसका अन्त लेबर पार्टी कि राजनितिक त्रासदी के रूप में हुआ। ब्रिटेन की जनता ने लगभग पाँच सालों तक इस योजना का विरोध किया। अंततः कैमरून सरकार ने 2010 में पहचान पत्र अधिनियम रद्द कर दिया, इसी प्रकार पहचान पत्रों और एक राष्ट्रीय पहचान रजिस्टर बनाने कि योजना भी खत्म कर दी। दूसरी तरफ, भारत सरकार आधार या एकल पहचान (यूआईडी) परियोजना को उत्साहपूर्वक प्रोत्साहित कर रही है। यूआईडी योजना को गृहमंत्रालय के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के साथ नत्थी किया जा चुका है। ‘‘राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण अधिनियम’’ संसद के पटल पर रखा गया है। दुनिया भर में पहचान नीतियों के पर्यवेक्षक देख रहे हैं कि भारत ‘‘आधुनिक’’ दुनिया से कुछ सबक लेता है या नहीं।

ब्रिटेन में पहचान पत्रों का अनुभव बताता हे कि मि. ब्लेयर मिथकों के सहारे इस कार्यक्रम की तिजारत कर रहे थे। पहला, उन्होंने कहा कि, पहचान पत्रों के लिए नामांकन कराना ‘‘स्वैच्छिक’’ होगा। दूसरा, उन्होंने तर्क दिया कि पत्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र और दूसरे हकदारी योजनाओं के दुरूपयोग को कम करेगा, डेविड ब्लंकेट ने तो इसे ‘‘पहचान पत्र’’ के बजाय ‘‘हकदारी पत्र’’ घोषित कर दिया। तीसरा, मि. ब्लेयर ने तर्क दिया कि पहचान पत्र नागरिकों को ‘‘आतंकवाद’’ और ‘‘पहचान की धोखाधड़ी से बचायेगा। इसके लिए बायोमिट्री तकनीक को रामबाण के रूप में पेश किया गया था। इस सभी दावों पर विद्धानों और जनमत द्वारा सवाल खड़े किये गये थे। लन्दन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स ने बहुत ही सावधानीपूर्वक एक रिपोर्ट दी थी जिसने उन सभी दावों की जाँच-पड़ताल करके उन्हें खारिज कर दिया (देखें ‘‘हाई कॉस्ट, हाई रिस्क’’ फ्रण्टलाइन, 14 अगस्त, 2009)। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि सरकार पहचान पत्र को इतने तरह के कार्यक्रमों के लिए जरूरी बनाती जा रही है कि वास्तव में यह अनिवार्य हो जायेगा। इसने यह भी तर्क दिया है कि पहचान पत्र के जरिये हकदारी कार्यक्रमों के लिए पहचान की धोखाधड़ी को खत्म करना भी सम्भव नहीं। बायोमीट्रिक तकनीक नकल रोकने का भरोसेमंद तरीका नहीं है।

आधारा को लेकर भारत में चलने वाली चर्चाएँ इसी से मिलती जुलती हैं। भारत के एक अरब से भी ज्यादा लोगों को यूआईडी संख्या प्रदान करने के लिए इस योजना के समर्थन में वैसी ही घिसीपिटी दलीलें पेश की गयीं। मेरा कहना है कि ब्रिटेन में विफल हो चुकी पहचान पत्र योजना की तरह भारत में भी मिथकों के आधार पर ही आधार योजना को प्रवर्तित किया गया। स्थानाभाव में हम यहाँ केवल तीन बड़े मिथकों की चर्चा करेंगे।

पहला मिथक: आधार संख्या अनिवार्य नहीं है।

यह गलत है। आधार को चोरी छुपे अनिवार्य बना दिया गया है। आधार को स्पष्टतया राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के साथ नत्थी कर दिया गया है। भारतीय जनगणना वेबसाइट में बताया गया है कि ‘‘एनपीआर में एकत्रित डाटा भारतीय एकल पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के अधीन होगा। दुहराव न हो, इसकी जाँच करने के बाद यूआईडीएआई एकल पहचान संख्या जारी करेगा। यह संख्या एनपीआर का हिस्सा होगा और एनपीआर कार्ड पर यह संख्या दर्ज रहेगी।

एनपीआर नागरिकता कानून 1955 में 2003 में किये गये संशोधन का नतीजा है। नागरिकता कानून 2003 की धारा 3(3) के अनुसार भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर में प्रत्येक नागरिक के बारे में उसकी एकत्र की गयी जारकारी में उसकी ‘‘राष्ट्रीय पहचान संख्या’’ दर्ज करना जरूरी होगा। इसके अलावा, नियम 7(3) कहता है कि ‘‘प्रत्येक नागरिक का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह एक बार स्थानीय नागरिकता रजिस्ट्रार के यहाँ जाकर अपना पंजीकरण कराये और अपने बारे में सही व्यक्तिगत विवरण दे। इससे भी आगे, नियम 17 कहता है कि ‘‘नियम 5, 7, 8, 10, 11 और 14 के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दण्डस्वरूप जुर्माना देना होगा जिसे हजार रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।’’

निष्कर्ष बिल्कुल साफ है : संसद में विधेयक पास होने से पहले ही आधार को अनिवार्य बना दिया गया है। इस परियोजना की आड़ में, सरकार लोगों को निजी सूचना देने के लिये जोर-जबरदस्ती कर रही है यह जबरदस्ती सजा देने की धमकी के रूप में सामने आती है।

दूसरा मिथक : आधार संयुक्त राज्य अमरीका के सामाजिक सुरक्षा संख्या (एसएसएन) की तरह ही है।

एसएसएन और आधार में बहुत ज्यादा फर्क है। अमरीकी सामाजिक सुरक्षा के प्राविधानों को आसान बनाने के लिये 1936 में एसएसएन लागू किया गया था। एसएसएन की एक घोषित विशेषता यह है कि इसे 1974 के गोपनीयता अधिनियम द्वारा सीमित कर दिया गया है। इस अधिनियम के अनुसार ‘‘किसी भी सरकारी एजेंसी के लिए किसी व्यक्ति को कानून द्वारा प्राप्त किसी अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार से इसलिए इनकार करना गैर-कानूनी होगा कि व्यक्ति विशेष अपनी सामाजिक सुरक्षा संख्या बताने से मना करता है। इसके अलावा, संघीय एजेन्सियों को उन व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा संख्याओं को किसी तीसरे पक्ष को बताने से पहले उनको सूचना देना और उनसे सहमति लेनी पड़ती है।

सामाजिक सुरक्षा संख्या को कभी भी पहचान का दस्तावेज नहीं समझा गया। फिर भी, 2000 के दशक में सामाजिक सुरक्षा संख्या का विभिन्न वितरण/प्रवेश केन्द्रों पर किसी की पहचान साबित करने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा। परिणामस्वरूप, व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा संख्यायें विभिन्न प्रकार के निजी खिलाड़ियों को पता चल गयी, जिसे पहचान चोरों ने बैंक खाता, उधार खाता, प्रसाधन ब्योरों और दूसरे निजी सूचना स्रोतों तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल किया। 2006 में, सरकारी जवाबदेही विभाग ने विवरण दिया की ‘‘एक साल के अन्दर, लगभग एक करोड़ लोगों, यानी अमरीका की 4.6 प्रतिशत जनसंख्या ने यह पाया कि वे किसी न किसी तरह के पहचान चोरी के शिकार हुए थे, जिससे उन्हें अनुमानतः 50 अरब डॉलर से भी अधिक का नुकसान हुआ। लोगों के कड़े विरोध के दबाव में राष्ट्रपति ने 2007 में पहचान-धोखाधड़ी पर एक टास्क फोर्स गठित की। इस रिपोर्ट पर अमल करते हुए राष्ट्रपति ने एक योजना घोषित की ‘‘पहचान-चोरी का मुकाबला: एक रणनीतिक योजना।’’ इस योजना के तहत सभी सरकारी कार्यालयों को ‘‘एसएसएन का अनावश्यक प्रयोग खत्म करने’’ और घटाने तथा जहाँ सम्भव हो, व्यक्तियों की पहचान में एसएसएन के प्रयोग की आवश्यकता को खत्म करने का निर्देश दिया गया। भारत में स्थिति बिलकुल उल्टी है। नन्दन निलकानी के अनुसार, आधार संख्या ‘‘सर्वव्यापी’’ होगी, यहाँ तक कि उन्होंने लोगों को सलाह दी है कि ‘‘अपने शरीर पर इसे गोदवा लो, ताकि भूल न जाओ।’’

तीसरा मिथक: पहचान चोरी को बायोमीट्रिक से खत्म किया जा सकता है।

पहचान सिद्ध करने में बायोमिट्रिक की सीमाओं के बारे में वैज्ञानिक एवं कानूनी विशेषज्ञों के बीच आम-सहमती है। पहला ऐसी कोई सूचना मौजूद नहीं है जिसके आधार पर यह माना जाय कि ऊंगली के छाप के मिलान में गलती बहुत कम या नहीं होती है। उपभोगकर्ताओं के एक छोटे हिस्से की ऊंगलियों का निशान हमेशा ही डाटाबेस से या तो गलत मेल खायेगा या मेल ही नहीं खायेगा।

दूसरा, भारत जैसे देश में ऐसे मिलान की गड़बड़ी बहुत अधिक बढ़ जायेगी। यूआईडीएआई ने बायोमिट्रिक यंत्रों की आपूर्ति के लिए जिस 4जी आइडेन्टिटी सोल्यूसन्स को ठेका दिया था उसने एक रिपोर्ट में कहा है किः ‘‘अनुमान है कि दाग या बुढ़ापे या अस्पष्ट छाप के कारण किसी भी आबादी के लोगों की ऊंगली की छाप घिचपिच होती है। भारतीय वातावरण का अनुभव यह बताता है कि यहाँ की बहुत बड़ी आबादी शारीरिक श्रम पर काफी अधिक निर्भर होती है, जिसके कारण नामांकन करने में नाकामयाबी 15 प्रतिशत तक है।’’ 15 प्रतिशत नाकामयाबी की दर का मतलब है लगभग बीस करोड़ लोगों को इस योजना से निकाल बाहर करना। यदि मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना) के कार्यस्थल और राशन की दुकानों पर ऊंगली की छाप जाँचने वाली मशीन लगा दी जाय तथा रोजगार और राशन खरीदने के लिए सही तस्दीक को जरूरी शर्त बना दिया जाय तो लगभग 20 करोड़ लोग इन कार्यक्रमों की पहुँच से हरदम बाहर रहेंगे।

असल में यूआईडीएआई ‘‘बायोमिट्रिक स्टैण्डर्ड कमेटी’’ की रिपोर्ट इन चिन्ताओं को ठीक मानता है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सही दोहराव न हो पाने की पूरी तरह गारंटी करने वाली एक महत्त्वपूर्ण शर्त ऊंगली की छाप का भारतीय परिस्थितियों में गहराई से अध्ययन नहीं किया गया है। लेकिन तकनीक की इस गम्भीर आलोचना के बावजूद सरकार इस परियोजना को लेकर अंधेरे में छलांग लगाने से नहीं मान रही है जिस के ऊपर 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आयेगा।

कहा गया है कि सच का सबसे बड़ा दुश्मन झूठ नहीं बल्कि मिथक होता है। एक लोकतांत्रिक सरकार को आधार जैसी विराट परियोजना को मिथकों के आधार पर शुरू नहीं करना चाहिए। ब्रिटेन के अनुभव से हमें यह सबक मिलता है कि सरकार द्वारा फैलाये गये मिथकों का भंडाफोड़ लगातार सार्वजनिक अभियान चला कर ही किया जा सकता है। भारत में आधार परियोजना का भंडाफोड़ करने के लिए एक जनांदोलन की शुरूआत करना बेहद जरूरी है।

(आर. रामकुमार टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में सहायक प्रोफेसर हैं। यह लेख 17 जुलाई को अंग्रेजी दैनिक द हिन्दूसाभार लिया गया है। अनुवाद- सतीश पासवान)

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