फिलिस्तीन पर इजरायली कब्ज़ा और बेलगाम लूट

गाजा और वेस्ट बैंक पर इजरायली कब्जे के चलते फिलीस्तीनी अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग 4.4 अरब पौण्ड से हाथ धोना पड़ता है. यह राशि उसके बहुत ही मामूली सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 85 फीसदी है. 29 सितम्बर को रम्माला में जारी एक रिपोर्ट में इस सच्चाई को उजागर किया गया.
रिपोर्ट में बताया गया है की फिलिस्तीन अर्थतंत्र पर विनाशकारी प्रभावों के साथ-साथ ‘कब्ब्जे की तिजरती’ इजरायली सरकार अपने देश के सरमायादारों को फिलीस्तीनी प्राकृतिक संसाधनों और पर्यटन क्षमता से मुनाफा बटोरने की खुली छूट देता है.
रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए फिलीस्तीनी ऑथारिटी के अर्थ-मंत्री अबु लिब्देह ने कहा की “फिलिस्तीनी जनता अपने प्रयासों से जो कुछ भी हासिल कर सकती थी, हमलावर ताकतें अपने ही देश में स्वतन्त्र लोगों के रूप में हमारी उस क्षमता से हमें वंचित करती है.” उन्होंने कहा कि “अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आगे यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इजराइल द्वारा शांतिवार्ता में सहयोग न करने की एक वजह यह भी है कि इस कब्ब्जे से वह भरपूर मुनाफा बटोरता है.” रिपोर्ट के मुताबिक अगर फिलिस्तीन पर इजराइल का कब्ज़ा नहीं होता तो वहाँ की अर्थव्यवस्था अब से दोगुनी होती और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दानदाताओं के फण्ड पर उसकी निर्भरता काफी कम हो जाती.
अर्थ मंत्रालय और एक स्वतंत्र संस्थान- एलायड रिसर्च इंस्टीट्यूट (जेरूसलम) द्वारा तैयार की गयी यह रिपोर्ट फिलीस्तीनी अर्थतंत्र को इजरायली कब्जे से होनेवाले सालाना नुकसान का हिसाब लगाने का पहला प्रयास है. “हमने जो गणना की है, उसके अनुसार 2010 में 6.897 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है जो फिलिस्तीन के अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद का 84.9 फीसदी है.”
रिपोर्ट बताता है कि “इस नुकसान के अधिकांश हिस्से का सुरक्षा खर्चों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह फिलिस्तीनी जनता को अपने ही प्राकृतिक संसाधनों से वंचित करने के लिए इजराइल द्वारा थोपे गए कठोर प्रतिबंधों के कारण हुआ है, जिनमें से अधिकांश संसाधनों का दोहन खुद इजराइल ही करता है.
रिपोर्ट के अनुसार हमलावरों ने “फिलीस्तीनी अर्थतंत्र पर तरह-तरह के ढेर सारे प्रतिबन्ध लाद दिए हैं. वे फिलिस्तीनी जनता को अपनी जमीन के बहुत बड़े हिस्से पर खेती करने और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने से वंचित करते हैं; वे फिलीस्तीनियों को वैश्विक बाजार से अलग-थलग करते हैं और उनके भूभाग को छोटी-छोटी, एक दूसरे से अलग-थलग “छावनियों” में तब्दील कर दिया है.
गाजा की घेराबंदी के चलते आयात और निर्यात, जिस पर अर्थव्यवस्था बहुत अधिक निर्भर थी, भारी प्रतिबन्ध है. आधारभूत ढाँचा ध्वस्त होने तथा पार्ट-पुर्जे और अन्य जरूरी चीजों की कमी के कारण उतने बिजली-पानी की आपूर्ति भी नहीं हो पाती कि उद्योग और खेती की जरूरत पूरी हो जाये.
बमबारी ने भौतिक संपदाओं और आधारभूत ढाँचे को तबाह कर दिया है. वेस्ट बैंक और गाजा, दोनों ही जगह रसायनों और उर्वरकों का ‘दोहरा इस्तेमाल’ होने का हौवा खड़ा करके उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, क्योंकि इजराइल कहता है कि इनका इस्तेमाल हथियार बनाने में किया जा सकता है. इसने विनिर्माण और खेती को बहुत ही बुरी तरह प्रभावित किया है.
गाजा के भीतर जरूरी सामानों और मजदूरों की आवाजाही को सीमित करना भी एक भारी आर्थिक अवरोध है. वेस्ट बैंक के शहरों और कस्बों के बीच सीधे रास्ते से दूरी और जिस रास्ते से जाने के लिए फिलिस्तीनियों को बाध्य किया जाता है, उसकी तुलना भी इस रिपोर्ट में की गयी है. उदाहरण के लिए, वेस्ट बैंक के उत्तर में नुबलुस शहर और जौर्डन घाटी में स्थित अल जिफ्तलिक के बीच सीधे रास्ते की दूरी 58 किमी है, जबकि फिलिस्तीनियों को जिस रास्ते से जाने पर मजबूर किया जाता है, उसकी दूरी 172 किमी है.
मृत सागर तक फिलिस्तीनियों की पहुँच पर रोक लगाने का मकसद उन्हें ख़निज, नमक और पर्यटन से होने वाली आय से वंचित करना है, जिससे इजराइल को सीधा लाभ मिलता है. रिपोर्ट बताती है की इजरायली कंपनियों द्वारा बनाये और बेचे जाने वाले मृत सागर सौन्दर्य प्रसाधनों और त्वचा रक्षक उत्पादों से इजराइल को डेढ़ करोड़ डॉलर सालाना की आमदनी होती है.
इजरायली पूँजीपति वेस्ट बैंक के खदानों और उत्खनन से भी भरपूर मुनाफा कमाते हैं. वेस्ट बैंक के जल स्रोतों से इजरायली बस्तियों तथा वहाँ के उद्योगों और खेती के लिए जलापूर्ति की जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ के तीन जलाशयों से फिलिस्तीन की तुलना में इजरायल 10 गुना अधिक पानी लेता है.
1967 से आज तक लगभग 25 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं, जिनमें जैतून के जंगल भी शामिल हैं.
फिलिस्तीनी किसान या तो अपनी जमीन गँवा चुके हैं या खेती नहीं कर पाते. अबू लिब्देह ने बताया कि “वेस्ट बैंक और पूर्वी जेरूसलम के 6,20,000 निवासी 64,000 दुनम जमीन पर खेती करते हैं. वेस्ट बैंक के 40 लाख निवासी केवल एक लाख दुनम जमीन पर खेती करते हैं. एक दुनम 1000 वर्ग मीटर के बराबर होता है.
उन्होंने कहा कि “हम अपना राज्य हासिल करने की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए हम टिकाऊ और व्यावहारिक फिलिस्तीन का निर्माण करना चाहते हैं जो आर्थिक रूप से व्यवहार्य, जलवायु कि दृष्टि से मजबूत और सामाजिक रूप से वैध हो.
(गार्जियन में प्रकाशित और द हिन्दू में 1 अक्टूबर को पुनर्प्रकाशित हैरियेट शेरउड के अंग्रेजी लेख “इजरायल प्रोफिटिंग फ्रॉम ओक्यूपेशन” का हिंदी अनुवाद)
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टिप्पणियाँ

  • Ashok Kumar Pandey  On नवम्बर 19, 2012 at 5:05 अपराह्न

    एक ज़रूरी आलेख. इजरायली बर्बरता मनुष्यता के इतिहास की सबसे भीषण बर्बरताओं में से है. इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद ही नहीं, हिन्दुस्तान जैसे देशों के दक्षिणपंथ का भी समर्थन मिलना इसे और खूंखार बनाता है.

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